मित्रता

प्रत्येक वर्ष 8 जून को राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1935 में अमेरिका में 8 जून को पहली बार राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस मनाया गया।

राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस: प्रत्येक वर्ष 8 जून को राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1935 में अमेरिका में 8 जून को पहली बार राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस मनाया गया। इसके बाद से दुनिया भर में हर साल यह दिवस मनाया जाने लगा। दुनिया में मित्र बनाना और मित्रता को समझना सबसे मुश्किल काम है। अच्छे ​मित्र जीवन में खुशियां लाते हैं और हर परिस्थिति में अपनी मित्रता निभाते हैं। दुनिया में मित्रता का रिश्ता सबसे खूबसूरत होता है। यह रंग-रूप, धन-दौलत और भेदभाव से परे होता है। आज के समय में जब भी मित्रता की बात होती है तो राम-सुग्रीव, कृष्ण-सुदामा, कृष्ण-अर्जुन, भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव-बिस्मिल-चंद्रशेखर आजाद का नाम सामने आता है। इनकी मित्रता ने साबित किया है कि अच्छे मित्र विपरित परिस्थितियों में भी अपनी मित्रता निभाते हैं, जिसके कारण ऐसी मित्रता को युगों-युगों तक याद किया जाता है।

श्रीरामचरितमानस के किष्किंधाकांड में बताया गया है कि जब सुग्रीव, हनुमानजी और जामवंत अपने कुछ वानर साथियों के साथ एक गुफा में बैठे थे। उस वक्त सुग्रीव ने वहां से दो राजकुमारों को जाते हुए देखा था। ये राजुकमार कोई और नहीं, बल्कि श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण थे। उन्होंने हनुमानजी को उनके पास उनका परिचय लेने के लिए भेजा। उस समय हनुमानजी वेश बदलकर उनके पास पहुंचे और पता लगाया कि वे कौन हैं। हनुमानजी ने ही सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता करवाई थी। इस प्रसंग में श्रीराम ने कहा है कि उपकार ही मित्रता का फल है। मित्र एक-दूसरे का भला करते हैं। एक-दूसरे को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं। वहीं, सुग्रीव श्रीराम से कहते हैं कि आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आज से हम दोनों के दुख और सुख एक हैं।

इसके बाद श्रीराम ने अपनी मित्रता निभाते हुए सुग्रीव को वाली द्वारा हड़पा गया उसका राज्य और उनकी पत्नी वापस दिलाई। वहीं, रावण के सीता का अपहरण करने के बाद जानकी को खोजने में सुग्रीव और उनकी वानर सेना ने श्रीराम की मदद। इस तरह दोनों ने अपनी सच्ची मित्रता निभाई।

इसी तरह श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भी एक मिसाल है। श्रीकृष्ण ने बचपन में सुदामा को वचन दिया था, ”मित्र तुम जब भी संकट में खुद को पाओ मुझे याद करना। मैं जरूर अपनी मित्रता निभाऊंगा।” गरीबी से बेहाल सुदामा जब अपने मित्र के पास एक पोटली में चावल लेकर पहुंचे तो श्रीकृष्ण से उनकी यह दुर्दशा देखी नहीं गई। उन्होंने एक मुट्ठी चावल के बदले सुदामा को एक लोक की संपत्ति दे दी। दूसरी मुट्ठी चावल खाकर दो लोक की संपत्ति दे दी। जैसे ही श्रीकृष्ण तीसरी मुट्ठी चावल खाने लगे रुक्मणि ने उन्हें रोकते हुए कहा कि प्रभु! यदि आप तीनों लोक की संपत्ति इन्हें दे देंगे तो अन्य सब जीव और देवता कहां जाएंगे? यह सुन श्रीकृष्ण रुक गए। इस तरह श्रीकृष्ण ने सुदामा की मदद की और प्रेमपूर्वक उन्हें विदा किया। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनकर पांडवों का मार्गदर्शन किया और कौरवों को परास्त कर उन्हें विजय दिलाई। मां भारती के अमर सपूतों भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव-बिस्मिल-चंद्रशेखर आजाद की दोस्ती बेमिसाल थी।

भारत ने हमेशा से ही मैत्री का संदेश दिया है। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने सच्‍चे मित्र का धर्म निभाते हुए महासंकट से जूझ रहे भूटान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार समेत कई देशों की मदद की।

ऐसा नहीं है कि मित्र केवल किसी व्यक्ति विशेष को ही बनाया जा सकता है। किताबें भी हमारी सर्वश्रेष्ठ मित्र होती हैं। किताबें पढ़ने से हमें दुनिया को देखने का अपना नजरिया बदलने में मदद मिलती है। अपने हर सवाल का जवाब और हर परेशानी से निकलने का हल मिलता है। किताबों से मित्रता करने वाला कभी भी अकेला नहीं रहता। ये मनुष्य को ज्ञान का अनमोल खजाना देती हैं और बदले में कुछ नहीं मांगती। न कोई शिकायत करती हैं।

‘दोस्ती अच्छी हो तो रंग लाती है
दोस्ती गहरी हो तो सबको भाती है।
दोस्ती वही सच्ची होती है
जो जरूरत के वक्त काम आती है।’

एक अच्छा मित्र एक अच्छा मार्गदर्शक भी होता है। राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ मित्र दिवस पर इस लेख को अपने मित्रों के साथ साझा कर दोस्ती के अहम रिश्ते को सेलिब्रेट करें।

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